पिछली सदी के सातवें दशक में ‘वाटरगेट कांड’ ने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन को अपनी गद्दी छोड़ने को मजबूर कर दिया, पर कांड को उजागर करने वाले पत्रकारों कार्ल बर्नस्टीन और बॉब वुडवर्ड ने अपने मुख्य स्रोत को 31 साल तक दुनिया की आंखों से ओझल ही रखा।

निक्सन के हटने के तीन दशक और उनकी मृत्यु के 11 साल बाद ही स्रोत का नाम उजागर किया। सरकार, पुलिस, जांच एजेंसियों और कानूनी कार्रवाइयों से विचलित न होते हुए 31 साल तक गोपनीयता बनाए रखने के लिए भी बर्नस्टीन और वुडवर्ड का नाम पत्रकारिता के इतिहास में दर्ज है।

लेकिन वह दौर कुछ और था। तब पत्रकारिता और मीडियाकर्म आज जैसे तकनीक आश्रित नहीं थे। तकनीक का उपयोग करके किसी भी सूचना और सूचनादाता की समस्त गोपनीयता को भंग करके तथ्य प्राप्त करना अब पूरी तरह मुमकिन है। अब ऐसी अनेक विधियां, और सॉफ्टवेयर विकसित उपलब्ध हैं, जिनसे न सिर्फ कंप्यूटर की हार्डडिस्क को खंगाला जा सकता है, बल्कि डिलीट की गई चीजों को भी हासिल किया जा सकता है। तकनीक से सूचनाएं सुगम जरूर बनी हैं, लेकिन इसके साथ ही गोपनीयता को लेकर खतरे बढे़ हैं।

दुनिया के उन देशों में, जहां मीडिया के सूचना-स्रोतों की गोपनीयता के कानूनी प्रावधान हैं, उन देशों में भी सामूहिक निगरानी और स्रोतों की राष्ट्रीय सुरक्षा या आतंकवाद की रोकथाम के नाम पर निगरानी के प्रावधान हैं। भारत में सूचना-संवाद स्रोतों की गोपनीयता की रक्षा के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। यहां सरकारों के लिए डिजिटल डाटा स्टोरेज का दुरुपयोग कर खोजी पत्रकारों या स्रोतों का उत्पीड़न आसान है।

विश्व में ‘वाटरगेट’ ही नहीं, खोजी पत्रकारिता के अनेक बड़े उदाहरण चर्चित रहे हैं। स्विस लीक्स में कोई एक लाख से अधिक बैंक ग्राहकों की 60 हजार से अधिक फाइलों के रहस्यों का पेरिस, जेनेवा, वाशिंगटन के खोजी पत्रकारों ने एक साथ जुड़कर उद्घाटन किया। अफशोर लीक्स में एक लाख तीस हजार खातों के जरिये तटीय कानूनों का लाभ उठाकर टैक्स चोरी का उद्घाटन, जिसमें 170 देशों के दो करोड़ पचास लाख खाते पत्रकारों ने खंगाले। दुनिया भर में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं।

स्वीडन ऐसा देश हैं, जहां समाचार स्रोतों की गोपनीयता के मजबूत कानूनी प्रावधान हैं। वहां तो अपने गोपनीय सूत्रों को उजागर करने पर पत्रकार को सजा हो सकती है।
खोजी पत्रकारों के लिए सावधानियां बरतने का यह दौर है। फोन और वाई-फाई को हमेशा और हर स्थान पर चालू रखना, हर सूचना को ई-मेल आधारित रखना खतरनाक हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या डिजिटल युग में गोपनीय सूत्रों पर आधारित खोजी पत्रकारिता संभव है? शायद यह अब भी नामुमकिन नहीं है, लेकिन इसके खतरे बहुत बढ़ गए हैं।

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