खोजी पत्रकारिता का नाम जहन में आते ही सबसे पहले आज हमारे जहन में स्टिंग का नाम सबसे पहले उभरता है। स्टिंग शब्द का नाम लेते ही हमारे सामने हाल का उमा खुराना और आपरेशन कलंक स्टिंग याद आते हैं। हालांकि दोनों ही स्टिंग अपने तरह के बिल्कुल अलग स्टिंग हैं। लेकिन एक आम दर्शक ने दोनों स्टिंग को ही फर्जी स्टिंग का रूतवा प्रदान कर खोजी पत्रकारिता के मुंह पर जिस तरह का तमाचा जड़ा है वह किसी भी पत्रकार के लिए सकारात्मक विचार कतई नहीं हो सकता। आखिर पत्रकार विचारों के आधार पर ही अपने आप को तौलता है और उसी सोच के मुताबिक कार्य करता है। लेकिन आज के दौर में जिस तरह से खोजी पत्रकारिता का परिहास उड़ाया जा रहा है वह वेशक चिंता का विषय तो है ही।

खोजी पत्रकारिता से जुड़े लोगों का मानना है कि वह आज इंमरजेंसी के दौर में अपना जीवन जी रहें हैं। उनके करने के लिए केवल अब वही सफेद पोश लोगों की चापलूसी करना भर है, जो वह माइक के उस तरफ से जो कह देते हैं वहीं सही है। अगर वह कह दें कि देश तरक्की कर रहा है तो देश तरक्की कर रहा है। अगर वह कह दें कि देश में कोई भूखा नहीं है तो सारा देश टीवी पर देश के प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर यह तय कर लेता है कि आज देश में कोई भूखा नहीं है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। हमारे देश में लगातार लोग भूख और गरीबी से जूझ रहें हैं। लगातार लोग भूख और गरीबी से मर रहें हैं। युवा बेरोजगार है और अपराध करने के लिये मजबूर है। वह चाह कर भी नौकरी नहीं कर पा रहा है क्योंकि रोजगार के नाम पर सरकार के पास योजनाओं का अंबार तो हैं लेकिन उन्हें लागू करने के लिए क्या है कुछ भी नहीं, ऊपर से लेकर नीचे तक जिस तरह का भ्रष्टाचार हमारे सिस्टम में हैं उससे पार पाना न आज मुमकिन है ना ही आने वाले पचास सालों में, इसका सीधा सा कारण है कि जो कुर्सी पर बैठ जाता है वह यह मान लेता है कि अब इस देश में सत्ता उसकी है। गरीब आदमी लगातार गरीब होता जा रहा है अमीर आदमी दिन रात अमीर हो रहा है।
इन सभी के बीच देश में स्टिंग एक ऐसी पत्रकारिता है जो इन सभी के चेहरों को बेनकाब करने में पूरी तरह से कामयाब रहीं। लेकिन सत्ता में आसीन कुछ आस्तीन के सांपों को ईमानदारों लोगों की इस पहल से भी गुरेज होने लगा। वह जानते हैं कि सरकार में रहते हुए या बाहर उनपर कोई भी लगाम नहीं कस सकता। स्टिंग रिपोर्टर ही उन्हें खुफिया कैमरे में कैद करके उनके चेहरों को बेनकाव कर सकता है। ऐसे में उन्हें अपने काले कारनामों को अंजाम देने में बेशक मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इससे निजात पाने का एक ही तरीका हो सकता है, कि स्टिंग ऑपरेशन को बंद कर दिया जाये। उन्हें इसका मौका भी मिला उमा खुराना प्रकरण के बाद। उमा खुराना मामले से पहले किसी भी स्टिंग को अखबार के पहले पन्नों पर जगह नहीं मिली। लेकिन ऐसा क्या खास था कि उमा खुराना मामला सभी अखबारों की लीड खबर बनी। इसका पहला कारण तो यह था कि उमा खुराना जैसा मामला स्टिंग की दुनिया का वह काला सच था जिसका अख़बारी लोग कई बर्षों से इंतजार कर रहें थे। क्योंकि अख़बार के लोग टीवी चैनलों के पत्रकार और टीवी चैनलों से अख़बारों का आज जिस तरह का 36 का आंकड़ा है वह एक पत्रकार ही ठीक तरह से बयान कर सकता है। अखबार को खोजी पत्रकार केवल पुलिस थानों या फिर पुलिस हेडक्वाटर जाकर चाय काफी और फोकट का समोसा डकार कर शाम की खबर लिख देता है। इसके विपरित चैनल का खोजी पत्रकार पुरे दिन एक अच्छी खबर की तलाश में भटकता रहता है। वह आफिस में बॉस की झाड़ भी सुनता है और खबर के लिए पसीना भी बहाता है। इसके एवज में अगर उसे कुछ खास सुविधा मिलती है तो यह खैनी खाकर अखबार में लिखने वाले चापलूस रिपोर्टर चैनल के रिपोर्टर से जलने लगते हैँ। अब जब उमा खुराना प्रकरण हो गया तो अखबारों को तो टी वी चैनल की टांग खीचनें का मौका मिल गया। बस फिर क्या था देश के सभी प्रमुख अखबार उमा प्रकऱण से रंग गये। मैं यहां अखबारों की रंजिश या साजिश की बात नहीं कर रहा। मैं बात कर रहा हूं केवल अखबारों के डर का उन्हें आज लगता है कि अगर न्यूज चैनल इसी रफ्तार से आगे बढ़ते रहें तो वह दिन दूर नहीं जब अखबार पुराने समय की बात हो जायेंगे।
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