लखनऊ: दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले संत कन्हैया प्रभु नंद गिरि भी जातिगत भेदभाव का शिकार रहे हैं. महामंडलेश्वर की पदवी के लिए नामित किए जाने वाले संत ने कहा कि वह कभी-कभी भेदभाव इतने दुखी हो जाते थे कि आत्महत्या का मन करता था. उन्होंने बताया कि साल 2016 में चंडीगढ़ में एक मंदिर में एक धार्मिक कार्यक्रम में एक पॉलिटिकल पार्टी के कुछ लोगों ने उन्हें बाहर जाने को कहा. उन्हें यहां से निकलना पड़ा. वहां सिर्फ ब्राह्मण बुलाए गए थे, जबकि वह दलित थे. इसके बाद सांसारिक मोह को त्याग दिया और जीवन को दूसरी दिशा में ले जाने की ठान ली. बता दें कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने संत बने कन्हैया प्रभु नंद गिरी को महामंडलेश्वर बनाने का फैसला लिया है. उन्हें अगले साल ये पदवी दी जाएगी.

 कई बार हुआ भेदभाव, लोग जातिगत शब्द से करते थे बात
अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बातचीत में दलित संत कंहैया प्रभु ने कहा कि ‘दलित समुदाय होने के कारण भेदभाव के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि कई बार भेदभाव हुआ. उन्हें खराब लगता था. लोग बात करते समय जातिगत शब्दों का इस्तेमाल करते थे. ऐसा कई बार होता था. वह भेदभाव से इतने दुखी होते थे कि कई बार उन्हें लगता था कि उन्हें आत्महत्या कर लेनी चाहिए. इसी बात से प्रभावित होकर उन्होंने कुछ करने की ठानी.’

महामंडलेश्वर बनने वाले पहले दलित संत
बता दें कि देश में यह पहला मौका होगा जब दलित समुदाय से संत बने किसी महात्मा को महामंडलेश्वर बनाया जा रहा है. 22 अप्रैल 2016 को उज्जैन कुम्भ में उन्हें विधिवत गोसाई साधु की दीक्षा जगद्गुरु पंचानंद गिरी जी महाराज ने दी. गोसाई साधु की दीक्षा के बाद उन्हें कन्हैया प्रभु नंद गिरि नाम मिल गया. फिलहाल कन्हैया प्रभु नंद गिरि पंजाब में रहते हैं.

आर्थिक स्थिति थी बुरी, बाद में मिलने लगा सम्मान
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कन्हैया प्रभु तब 7 साल की उम्र से थे. वह मजदूरी करने लगे थे. पिता सब्जी बेचते थे. घर को आर्थिक सहयोग करने के लिए उन्हें भी काम करना पड़ता था. इसी बीच उन्हें जातिगत भेदभाव से दुखी होते थे. इसी वजह से उनका संस्कृत और ज्योतिष सीखने की ठानी. इससे जुड़ी किताबें ध्यान से पढ़ते थे. 2008 में चंडीगढ़ में ज्योतिष विज्ञान परिषद से जुड़े. यहां से डिग्री ली. ज्योतिष से पीजी किया. इसके बाद चीजें बदल गईं. उनका जीवन बदल गया. उन्हें सम्मान मिलने लगा. हर वर्ग के लोग उन्हें सम्मान देने लगे.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया  व http://www.india.com से  साभार 

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