बेबाक कलम /तामेश्वर सिन्हा 

बस्तर : छत्तीसगढ़ में आजाद पत्रकारिता का सच यह है कि लिखने-बोलने वाले पत्रकार साफ्ट टारगेट पर हैं। प्रदेश में इन दिनों पत्रकार और पत्रकारिता दोनों खतरे में हैं। लगातार खबरनवीसों पर दमनात्मक हमले अथवा मामले दर्ज किए जा रहे हैं। प्रेस की आजादी का ढिंढोरा पूरे देश में पीटा जाता है लेकिन क्या सही मायने में छत्तीसगढ़ के पत्रकार आजाद होकर लिख पा रहे हैं। क्या मीडिया संस्थान पूंजीपतियों के गुलाम बन कर नहीं रह गए हैं? 

राजधानी के स्वतंत्र पत्रकार सुधीर तम्बोली कहते हैं कि “हम मीडिया मालिकों के गुलाम बन कर काम कर रहे हैं। स्वतंत्र होकर पत्रकारिता करते हैं तो सरकार दमनात्मक कार्रवाई करती है और बेबाकी से पत्रकारिता करने की चाहत रखते हैं तो मीडिया संस्थान कुचल देता है।” 

आप को बता दें हाल ही में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला पर एक कथित कार्टून को शेयर करने को लेकर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। वहीं राजधानी रायपुर के पत्रकार ब्यासमुनि द्विवेदी पर खनन माफियाओं द्वारा प्राणघातक हमले की खबर है। उनकी गाड़ी को भी माफियाओं ने आग के हवाले कर दिया। छत्तीसगढ़ के ही रायगढ़ जिले में पत्रकार नितिन सिन्हा, सौरभ अग्रवाल के ऊपर भाजपा समर्थित लोगों ने झूठे मामले दर्ज कराए हैं। पत्रकारों के ऊपर ऐसे करीब दर्जनों मामले प्रदेश में महीने भर के अंतराल में दर्ज किए गए हैं। 

जानकारी हो कि शीतकालीन सत्र के दौरान विधानसभा में विपक्ष के नेता टीएस सिंहदेव के सवाल के लिखित जवाब में गृह मंत्री रामसेवक पैकरा ने बताया कि जनवरी, 2017 से 29 नवंबर, 2017 तक छत्तीसगढ़ राज्य की पुलिस ने कुल 14 पत्रकारों को गिरफ्तार किया है। 

जिसमें एक मंत्री के कथित सीडी कांड में गिरफ्तार किए गए वरिष्ठ पत्रकार वीनोद वर्मा भी हैं। इनकी गिरफ्तारी से पत्रकारिता जगत में काफी बवाल हुआ था। और राज्य की रमन सरकार की बड़ी किरकिरी हुई थी।

छत्तीसगढ़ पत्रकार सुरक्षा कानून की लड़ाई अभी भी मुकाम पर नहीं पहुंच सकी है। गौरतलब है कि मानवाधिकार संगठन और पत्रकारों ने मिल कर पत्रकार सुरक्षा कानून का संयुक्त ड्राफ्ट तैयार किया था लेकिन सरकार की उसे लागू करने में कोई रुचि नहीं है। वहीं विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी इसे विधानसभा में पेश करने को लेकर आनाकानी कर रही है । 

प्रदेश में प्रेस क्लबों को मिला कर दर्जनों पत्रकार संगठन हैं । लेकिन पत्रकारों के हमले पर उनकी घिग्घी बंध जाती है। कारण ये बताया जाता है कि यह हमारे संघ का सदस्य ही नहीं है। पत्रकार दिनेश सोनी कहते हैं कि “संघ-संगठन पत्रकारों के बीमा में उलझे हुए हैं। पत्रकारिता की आजादी की बात कोई नहीं करता है। जो सरकार दमन में लगी रहती है उसी का मेहमानवाजी किया जाता रहा है”। 

आप को बता दें आज भी प्रदेश के पत्रकार भय के बीच अपनी पत्रकारिता करते हैं। राज्य सरकार, ख़ासकर पुलिस की ओर से, पत्रकारों पर वैसी ख़बरें छापने का दबाव बनाया जा रहा है जैसा वे चाहते हैं या ऐसी ख़बरें रोकने को कहा जाता है जिन्हें प्रशासन अपने ख़िलाफ़ मानता है। इन क्षेत्रों में काम कर रहे पत्रकारों को माओवादियों का भी दबाव झेलना पड़ता है।

प्रचुर खनिज संपदा वाले छत्तीसगढ़ में किसान, मज़दूर, बहुजन, आदिवासियों पर सरकारी दमन की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। जल, जंगल और ज़मीन से आदिवासी दूर किये जा रहे हैं। अपने हक-हुकूक के लिए वे लगातार संघर्षरत हैं। इन सबके बीच अगर पत्रकार बेबाकी से लिखता पढ़ता है तो सरकार फर्जी मुकदमों के तहत फंसा दिए जाते हैं। सूबे में हाल के महीनों में घटित कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो स्थिति की भयावहता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

एक पत्रकार ने अपना नाम न देने की शर्त पर कहा कि संस्थान से भी उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। जब भी वह कोई समाचार सरकार का लेकर आते है संस्थान उनकी खबरें रद्दी की टोकरी में डाल देता है। क्योंकि उनका संस्थान एक प्रकार से सरकार ही चलाता है । 

इन सब घटनाओं के बीच आज पत्रकार स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पा रहे हैं संस्थान के सरकारी एजेंडे के तहत पत्रकारों को काम करना पड़ता है। लिहाजा वो खुल कर नहीं लिख पा रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर सरकार लगातार पत्रकारों पर दमनात्मक कार्रवाई के जरिये उनकी बची-खुची आजादी को भी दबा देने की कोशिश कर रही है। 

इस वर्ष जारी विश्व प्रेस सूचकांक के अनुसार 180 देशों में भारत 138वें स्थान पर था। 2017 में भारत 136वें और 2016 में 133वें स्थान पर था। ज्यादातर पत्रकारिता और पत्रकारों पर हमले में राजनीतिज्ञ, व्यापारी, हिंदू दक्षिणपंथी समूह, पुलिस, अर्धसैनिक बल पत्रकारिता की आजादी पर लगाम कसने में आगे हैं। 

(तामेश्वर सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और आजकल बस्तर में रहते हैं।)

http://janchowk.com से साभार

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