खास रिपोर्ट /गोविंद पंत राजू

लखनऊ : विकास की दौड़ में उत्तर प्रदेश भले ही कोई उपलब्धि हासिल न कर पा रहा हो, लेकिन भ्रष्टाचार के मोर्चे पर नए कीर्तिमान स्थापित करने में यह सूबा सबसे आगे दिखता है. ब्यूरोक्रेट हों या टेक्नोक्रेट, भ्रष्टाचार की होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के आईएएस अधिकारियों ने अपने बीच से सबसे भ्रष्ट तीन अधिकारियों का चयन करने के लिए मतदान किया था. इसमें चुने गये तीन महाभ्रष्टों में से दो को मुख्य सचिव पद से इसी वजह से हटना पड़ा था. लेकिन अब लगता है जैसे भ्रष्ट होना पहली काबिलियत बन गया है.

हालांकि कुछ लोग इस काबिलियत के बाद भी कानून के शिकंजे में फंस जाते हैं. अपने बैच के टाॅपर रहे एक आईएएस अधिकारी इन दिनों एनआरएचएम घोटाले के लिए जेल में हैं. एक दर्जन अधिकारी मुकदमे झेल रहे हैं और 64 अधिकारियों के खिलाफ विजिलेंस जांच पूरी होकर मुकदमे की मंजूरी के लिए सरकार के पास पड़ी है. विभागीय जांचों का तो कोई हिसाब ही नहीं है. राज्य के डीजीपी पद पर तैनाती के लिए करोड़ों की रिश्वत, तबादलों और मनचाही तैनाती के लिए बोलियां लगने जैसी चर्चाएं अब सूबे के लोगों को चौंकाती नहीं. पीसीएस अधिकारी हों या डाक्टर, सबके सब भ्रष्टाचार के मामलों में जेलों में होने, जमानत पर होने या मुकदमों में फंसे होने के नए रिकार्ड बनाते जा रहे हैं.

2007 में उनका दूसरी बार निलंबन हुआ, पर छह महीने के भीतर ही मायावती सरकार ने उन्हें बहाल कर दिया, तब उन पर ट्रॉनिका सिटी में 400 से ज्यादा औद्योगिक प्लाट मनमाने दाम पर बेचने का आरोप था.  

इस क्षेत्र में सबसे नए और शायद बड़े रिकार्डधारी हैं उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (यूपीएसआईडीसी) के चीफ इंजीनियर अरुण मिश्र. वे नोएडा के चमत्कारी इंजीनियर यादव सिंह को भी पीछे छोड़ चुके हैं. अरुण मिश्र की ख्याति का पता इसी बात से चल जाता है कि बीते अप्रैल में वे पांचवीं बार निलंबित हुए हैं. वे एक बार बर्खास्त भी हो चुके हैं. बहुत से लोग मान रहे हैं कि पिछली कई बारों की तरह इस बार भी वे जांच को गच्चा देकर बहाल हो जाएंगे.

वैसे इस बार अरुण मिश्र पर उतने बड़े आरोप भी नहीं हैं. इससे पहले उन पर करोड़ों के भ्रष्टाचार, फर्जी सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने, करोड़ों के काले धन को खपाने के लिए कई दर्जन फर्जी बैंकखातों का संचालन करने, अरबों की बेनामी संपत्ति बनाने, मुख्यमंत्री कार्यालय के कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर बड़ा फर्जीवाड़ा करने और यूपीएसआईडीसी के सारे कायदे-कानूनों को दरकिनार कर मनमानी करने जैसे हर तरह के आरोप लग चुके हैं. हालांकि भ्रष्टाचार के जरिये कमाई गई अकूत संपत्ति के जरिए वे हर बार हर आरोप को अंगूठा दिखाते रहे हैं.

अरुण मिश्र 1986 में सहायक अभियंता के तौर पर यूपीएसआईडीसी में नियुक्त हुए थे. जिन डिग्रियों के आधार पर उन्होंने नौकरी पाई थी उनके फर्जी होने के आरोप भी उन पर लग चुके हैं. 1988 में वे भ्रष्टाचार के आरोप में पहली बार निलंबित हुए लेकिन कुछ ही महीनों में बहाल हो गए. भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद 2002 में वे चीफ इंजीनियर बना दिए गए. 2007 में उनका दूसरी बार निलंबन हुआ, पर छह महीने के भीतर ही मायावती सरकार ने उन्हें बहाल कर दिया, तब उन पर ट्रॉनिका सिटी में 400 से ज्यादा औद्योगिक प्लाट मनमाने दामों पर बेचने का आरोप था.

2011 में सीबीआई ने अरुण मिश्र खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में जांच की और गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल भेजा गया. इसी दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी उनके खिलाफ जांच शुरू कर दी और एक मामला उत्तर प्रदेश की एसआईटी ने भी दर्ज किया. उस समय नई दिल्ली की पृथ्वीराज रोड यानी लुटियन जोन में स्थित 300 करोड़ से ज्यादा कीमत का उनका बंगला भी सीज किया गया. मगर छह महीने तक जेल में रहने के बावजूद नवंबर 2012 में अखिलेश सरकार ने उन्हें बहाल कर दिया.

इसके बाद अरुण मिश्र एक बार फिर निलंबित हुए. उनका यह विभागीय निलंबन तब हुआ जब उनके फर्जी सर्टिफिकेट का मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में गया. इसी मामले में अदालत ने 30 अगस्त 2014 को अखिलेश सरकार को उन्हें बर्खास्त करने का आदेश दिया. अदालत ने उनसे 25 वर्ष से अधिक की अवधि का वेतन भी वसूल करने का आदेश दिया. लेकिन इसके खिलाफ अरुण मिश्र सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और अपनी बर्खास्तगी पर 29 सितंबर 2014 को स्टे ले लाए. मामला अभी चल रहा है. 30 सितंबर को उन्होंने फिर से पद भार संभाल लिया.

नई दिल्ली में पृथ्वीराज रोड यानी लुटियन जोन में 300 करोड़ से ज्यादा कीमत का उनका बंगला सीज भी किया गया. मगर छह महीने तक जेल में रहने के बावजूद नवंबर 2012 में अखिलेश सरकार ने उन्हें बहाल कर दिया

इसके बाद 12 फरवरी, 2015 को राज्य के मुख्य सचिव के आदेश पर अरुण मिश्र के सारे वित्तीय अधिकार ‘सीज’ कर दिए गए. जानकार बताते हैं कि मिश्र ने इसका बदला अपने खिलाफ जांच करने वाले अधिकारी को ही भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसाकर ले लिया. मुख्यमंत्री सचिवालय के कुछ अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके उन्होंने यूपीएसआईडीसी के पूर्व प्रबंध निदेशक अमित घोष के खिलाफ 1100 करोड़ रु के घपले और 300 करोड़ रु की रिश्वतखोरी के आरोप की विजिलेंस जांच के फर्जी आदेश जारी करवा लिए.

दो जून को इस मामले की जानकारी होते ही राज्य में हड़कंप मच गया. इसके बाद मुख्यमंत्री के निजी सचिव दीपक श्रीवास्तव और अपर निजी सचिव काशीनाथ तिवारी को उनके पदों से तत्काल हटा दिया गया. इस फर्जीवाड़े के लिए तीन जून 2017 को अरुण मिश्र के खिलाफ एसआईटी ने मामला दर्ज कर लिया. लेकिन मुख्यमंत्री के सीधे दखल के बावजूद 10 महीने तक अरुण मिश्र अपनी मनमानी करते रहे और बीते अप्रैल में ही उनका सिर्फ निलंबन ही हो पाया है. केस दर्ज करने के 10 महीने बाद भी एसआईटी उनके खिलाफ जांच में एक कदम भी आगे नहीं आगे बढा सकी है तो इसकी वजह यह है कि उन्हें इसके खिलाफ कोर्ट से स्टे मिला हुआ है.

अरुण मिश्र पर चलने वाला सबसे बड़ा मामला आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार का है. 2011 में ईडी ने उनके खिलाफ जो जांच की थी उसकी रिपोर्ट से चलता है कि मिश्र ने काला धन खपाने के लिए किस तरह के फर्जीवाड़े किये थे. ईडी के मुताबिक सीबीआई की देहरादून शाखा को एक सूचना मिली थी. इसमें कहा गया था कि पंजाब नेशनल बैंक के पांच कर्मचारियों और कुछ व्यक्तियों ने नवंबर 2005 से दिसंबर 2006 के बीच एक आपराधिक साजिश के तहत देहरादून और हरिद्वार में कई फर्जी बैंक खाते खोले. इनमें करीब तीन करोड़ इकत्तीस लाख रुपये जमा किए गए जिन्हें बाद में बैंक कर्मियों की मदद से निकाल लिया गया. इसी आधार पर सीबीआई ने 24 फरवरी 2011 को देहरादून में पांच व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

एसआईटी में कोई भी मुकदमा शासन की अनुमति के बाद ही दर्ज होता है. लेकिन इस मामले में शासन से कोई आदेश जारी नहीं हुआ था. माना जाता है कि जांच का यह हथकंडा मिश्र ने खुद ही तैयार किया था 

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के अलावा कानपुर स्थित स्टेट बैंक आफ इंदौर, पंजाब नेशनल बैंक और सिंडीकेट बैंक में भी दसियों फर्जी खाते खोले गये थे. इन खातों को खोलने के लिए जाली ड्राइविंग लाइसेंसों और नकली पैन कार्डों को इस्तेमाल किया गया. जांच में यह बात सामने आयी है कि इन खातों से करीब आठ करोड़ बीस लाख रु का लेन-देन किया गया था.

2011 में भी एसआईटी ने मिश्र पर एक मामला दर्ज किया था. यही मामला करीब सात साल से अरुण मिश्र के लिए सुरक्षा कवच बना हुआ है. दरअसल एसआईटी में कोई भी मुकदमा शासन की अनुमति के बाद ही दर्ज होता है. लेकिन अरुण मिश्र के मामले में बिना शासन की अनुमति के ऐसा किया गया था. इस एसआईटी जांच पर अरुण मिश्र को हाई कोर्ट से स्टे मिला हुआ है.

शासन की अनुमति के बगैर एसआईटी में मुकदमा कैसे दर्ज हुआ, यह बात अब भी एक रहस्य बनी हुई है. जिस दौरान यह मामला दर्ज हुआ तब प्रदेश में बसपा की सरकार थी. माना जाता है कि जांच का यह हथकंडा मिश्र ने खुद ही तैयार किया था. 2014 में इसके आधार पर देहरादून में सीबीआई द्वारा दर्ज मुकदमे की चार्जशीट खारिज हुई और 2015 में ईडी का मामला भी. इसका कारण यह बताया जाता है कि इन दोनों एजेंसियों ने अपनी जांच का आधार एसआईटी द्वारा दर्ज मामले को भी बनाया था. इस तरह से आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार के बड़े मामले में वे कानून की इस छोटी सी ढाल का पूरा फायदा ले रहे हैं.

अरुण मिश्र पर यूपीएसआईडीसी का मनचाहा दुरुपयोग करने के अनगिनत आरोप हैं और इससे हुई कमाई के जरिये लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी, देहरादून और नई दिल्ली में बेनामी संपत्तियां बनाने के भी. इसके अलावा उनकी कई कंपनियों में हिस्सेदारी भी बताई जाती है.

आरोप हैं कि मिश्र के चीफ इंजीनियर (प्रोजेक्ट) रहते हुए नोएडा के सूरजपुर औद्योगिक क्षेत्र में औद्योगिक प्रयोग की एक जमीन होटल प्रोजेक्ट के लिए दे दी गई. इसी तरह साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र साइट-4 के जो दो प्लाॅट औद्योगिक इस्तेमाल के थे, 2007 में मिश्र ने अलाॅटी के साथ मिलीभगत कर उन पर थ्री स्टार होटल बनाने की अनुमति दे दी. ये दोनों ही काम उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर के थे. गाजियाबाद में लोनी रोड का प्लाॅट नम्बर-15 मीनल स्टील्स के नाम अलाॅट था. यूपीएसआईडीसी की अनुमति के बिना 2007 में उन्होंने यहां मल्टीप्लेक्स बनवा दिया. इसी तरह उनके संरक्षण में उन्नाव की ट्रांस गंगा सिटी में बिना काम के छह करोड़ रुपयों का भुगतान किया गया जबकि बिलों पर सहायक अभियंता ने हस्ताक्षर तक नहीं किए थे.

उन पर लग रहे इस तरह के आरोपों की लंबी सूची में एक यह भी है कि उन्होंने लखनऊ के अमौसी औद्योगिक क्षेत्र में एक्जिबिशन सेंटर के लिए मिली जगह पर एक पांच मंजिला इमारत बनवा दी. इस तरह से बिना लैंड यूज बदले वहां एक भवन बना और सलाहकार और ठेकेदार को गलत तरीके से चुनकर उन्हें करीब 27 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया गया.

मिश्र को कानूनी राहत दिलाने में नामी-गिरामी वकीलों का भी बड़ा सहयोग रहा है. इसके चलते उनके खिलाफ यह शिकायत भी की गयी थी कि एक लाख से कम वेतन के बावजूद वे इन वकीलों की महंगी फीस कहां से देते हैं  

सीएजी की एक रिपोर्ट भी अरुण मिश्र की ऐसी कई कारगुजारियों की पोल खोलती है. मसलन ट्राॅनिका सिटी गाजियाबाद में 96,600 वर्ग मीटर ग्रुप हाउसिंग के प्लाॅट और 76,640 वर्ग मीटर कमर्शियल प्लाॅट एलाॅट किए गए थे. ग्रुप हाउसिंग प्लाॅट का मूल्य 12-13 हजार रूपये प्रति वर्ग मीटर के बीच रखा गया था. अरूण मिश्र ने उन प्लाॅटों को 3,200 से 4,475 की दर पर बेच दिया. इसी तरह से कमर्शियल प्लाट का मूल्य 15 हजार रूपये प्रति वर्गमीटर तय किया गया था. अरूण मिश्र ने इन प्लाटों को मात्र 5,500 से 11,500 रूपये की दर पर बेच दिया. सरकार को इससे 152 करोड़ से भी ज्यादा की चपत लगी. मगर इसके बावजूद पूरे महकमे को घर की खेती बनाकर रखने वाले अरूण मिश्र के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी.

अरुण मिश्र के बारे में कहा जाता है कि भ्रष्टाचार के खेल में वे राजनेताओं को साधने में महारत रखते हैं. मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, और मायावती के दौर में जब भी उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच या कोई कार्रवाई हुई तब-तब राजनीतिक संरक्षण के चलते हर बार वे निलंबन, अधिकार छीने जाने और अन्य कार्रवाईयों से बचते रहे. मिश्र को कानूनी राहत दिलाने में कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, अभिषेक मनु सिंघवी, शांति भूषण, सोली सोराबजी और हरीश साल्वे जैसे नामी-गिरामी वकीलों का भी बड़ा सहयोग रहा है. इसके चलते अरुण मिश्र के खिलाफ यह शिकायत भी की गयी थी कि एक लाख से कम वेतन के बावजूद वे इन वकीलों की महंगी फीस कहां से देते हैं.

कुल मिलाकर कानूनी राहत के जरिए ही मिश्र सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और एसआईटी की जांचों के बाद भी सींखचों से बाहर हैं. यहां तक कि बर्खास्तगी से भी बचे हुए हैं. अब भ्रष्टाचार के खिलाफ तत्पर दिखने वाली योगी सरकार किस तरह अरूण मिश्र के काले कारनामों पर नकेल कस पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा.

satyagrah.scroll.in से साभार

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