इतिहास साक्षी है कि पेशवाओं ने अछूत माने जाने वालों पर क्रूर सामाजिक बंधन लगाए थे। उन्हें अपने गलों में बर्तन बांधकर रहना पड़ता था ताकि वे जमीन पर थूककर उसे अपवित्र न कर दें। जब वे चलते थे तो रास्ता झाड़ू से बुहराते जाते थे। यह झाड़ू उन्हें अपनी कमर से बांधे रखना पड़ा था। दलितों को कोरेगांव भीमा की वह लड़ाई पेशवाओं से बदला लेने का अवसर लगी थी।

पुणे के निकट कोरेगांव भीमा में दो सौ साल पहले एक लड़ाई लड़ी गई थी। इसी नव वर्ष के दिन उस लड़ाई की याद को ताजा किया गया है। देशभर से दलित नेता एकत्र हुए थे इस अवसर पर। हां, यह लड़ाई एक तरह से दलित अस्मिता की ही लड़ाई थी। दो सौ साल पहले इस मैदान में अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की विशाल सेना को हराया था। इतिहास में दिए गए वर्णन के अनुसार हजÞारों सैनिकों वाली पेशवाई सेना के सामने अंग्रेजों की लगभग पांच सौ सैनिकों वाली ‘बाम्बे नेटिव इन्फ्रेंट्री’ ने बारह घंटे की भीषण लड़ाई लड़ी थी। इस लड़ाई के फलस्वरूप अंग्रेजों के पैर भारत की जमीन पर अच्छी तरह जम गए थे। इसलिए, उस लड़ाई का महत्व असंदिग्ध है। पर इसके महत्व का एक अध्याय यह भी है कि अंग्रेजों की तरफ से लड़ने वाले वे पांच सौ सैनिक महार थे और वे यह लड़ाई पेशवाओं के हाथ होने वाले अपने जातीय अपमान के बदले के रूप में लड़ रहे थे।

इतिहास साक्षी है कि पेशवाओं ने अछूत माने जाने वालों पर क्रूर सामाजिक बंधन लगाए थे। उन्हें अपने गलों में बर्तन बांधकर रहना पड़ता था ताकि वे जमीन पर थूककर उसे अपवित्र न कर दें। जब वे चलते थे तो रास्ता झाड़ू से बुहराते जाते थे। यह झाड़ू उन्हें अपनी कमर से बांधे रखना पड़ा था। दलितों को कोरेगांव भीमा की वह लड़ाई पेशवाओं से बदला लेने का अवसर लगी थी। और उन्होंने खूब बदला लिया। पेशवा हारे अवश्य थे, पर ऐसा नहीं है कि इस हार से दलितों के प्रति कथित सवर्ण समाज का रुख बदल गया। और यह रुख सिर्फ पेशवाओं तक सीमित नहीं था। सारे देश में दलितों को इस भीषण भेद-भाव का शिकार होना पड़ता था। दलितों के उत्पीड़न की कहानियां देशभर में फैली हुई हैं।

दक्षिण में दलित की छाया भी शरीर से छू जाने पर इन कथित उच्च वर्ण वालों का शरीर अपवित्र हो जाता था, उत्तर में दलित जूते पहन कर सवर्णों के सामने से नहीं गुजर सकते थे। कह सकते हैं कि ये सब पुराने जÞमाने की बातें थीं, पर, दुर्भाग्य से, आज भी, यानी इक्कीसवीं सदी में भी, हमारा भारतीय समाज सामाजिक विषमता के इस जाल से मुक्त नहीं हो पाया है। स्थितियां बदली हैं, यह सच है। यह भी सच है कि स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने वाला मुख्य शिल्पी एक दलित ही था।

हम इस पर गर्व कर सकते हैं कि बाबा साहेब आम्बेडकर के नेतृत्व में हमारे संविधान-निर्माताओं ने देश को एक ऐसा संविधान दिया जो मनुष्यों की समानता और बंधुता की गारंटी देता है। लेकिन सच यह भी है कि सारे परिवर्तनों और सारे सुधारों के बावजूद आज भी देश में दलितों को मनुष्य न समझने वाली मानसिकता किसी न किसी रूप में जिंदा है। आज भी सिर्फ मूंछ रखने के कारण देश में कोई दलित अपमानित किया जा सकता हैं। आज भी कोई दलित दूल्हा गाजे-बाजे के साथ बारात ले जाने पर, तथाकथित सभ्य समाज द्वारा प्रताड़ित हो सकता है। आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग हैं जो अपने घरों में दलितों के लिए पृथक बर्तन रखते हैं। सामाजिक एकता और सामाजिक समता की दुहाई हम अवश्य देते हैं, छुआछूत कानूनन अपराध है हमारे देश में। हमारे आज के शासकों और नेताओं में आज दलित समाज के बहुत से लोग शामिल हैं। लेकिन इस सबके बावजूद जातीयता का कैंसर हमारे राष्टÑीय शरीर में जिंदा है।

अक्सर उत्पात मचाता रहता है यह कैंसर। हमारे नेता, हमारे राजनीतिक दल जातीय विषमता के खिलाफ खूब बोलते हैं, पर राजनीतिक स्वार्थ के लिए जातीय समीकरणों का लाभ उठाना उन्हें कतई गलत नहीं लगता। एक सचाई यह भी है कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए दलित समाज को आज भी यह लग रहा है कि अपने अस्तित्व और अपनी अस्मिता की लड़ाई उसे खुद ही लड़नी है। यह सही है कि खुद लड़नी पड़ती है अपनी लड़ाई, लेकिन सामाजिक विषमता की इस लड़ाई की सार्थकता और सफलता इसी में है कि सारा भारतीय समाज एक होकर एक-दूसरे के लिए यह लड़ाई लड़े। वस्तुत: यह सामूहिक और सामाजिक सोच में बदलाव की लड़ाई है। इसलिए, यह भी शर्म की ही बात है कि दलितों को आज भी यह लग रहा है कि कथित सवर्ण उन्हें समानता का अधिकार नहीं देंगे और ये कथित सवर्ण यह स्वीकार नहीं कर पा रहे कि सामाजिक समानता की यह लड़ाई स्वयं को मनुष्य समझने वाले हर नागरिक की लड़ाई है।

आजादी प्राप्त कर लेने के सत्तर साल बाद भी यदि कोरेगांव भीमा की लड़ाई का दो सौ साल का जश्न मनाना दलितों को जरूरी लग रहा है तो इसे एक सामाजिक विफलता के रूप में ही स्वीकारा जाना चाहिए। आदर्श स्थिति तो यह होनी कि समूचा भारतीय समाज मिलकर यह जश्न मनाता। दो सौ साल पहले महार सैनिकों ने पेशवाओं को हराकर सामाजिक भेद-भाव और अत्याचार के खिलाफ एक जीत हासिल की थी। वस्तुत: वह लड़ाई मानवीय समता की लड़ाई थी, मनुष्यता के अस्तित्व की लड़ाई थी। यह वह लड़ाई है जो अनवरत चलती रहनी चाहिए। बावजूद इसके कि एक जनवरी को पुणे के निकट विजय-पर्व मनाने सिर्फ दलित पहुंचे थे, इस बात को समझना जरूरी है कि मनुष्य की समता और एकता का अधिकार कोई किसी को देगा नहीं, यह विजय समाज के हर सदस्य को स्वयं अर्जित करनी होगी।

हमारे देश में, हमारे समाज में कई-कई स्तरों पर लड़ी जा रही है यह लड़ाई। पर सचाई यह भी है कि अक्सर समता की यह लड़ाई आकर्षक जुमलों और नारों तक सिमट कर रह जाती है। सबका साथ, सबका विकास का नारा हो या फिर कतार में खड़े आखिरी आदमी को आगे लाने की बात, हकीकत यह है कि अक्सर ये पैतरे राजनीतिक स्वार्थों की कुश्ती जीतने का साधन मात्र बन जाते हैं। और एक सचाई यह भी है कि मनुवाद या ब्राह्मणवाद जैसे विचारों की नारेबाजी में दलितों की वास्तविक समस्याएं और व्यथाएं कहीं खो जाती हैं। ऐसी स्थिति न बने, या यह स्थिति समाप्त हो, इसकी चिंता और चिंतन की आवश्यकता है। फिर सवाल सिर्फ उन दलितों का ही नहीं है जो सदियों से दमित और पीड़ित हैं। वस्तुत: वे सब दलित हैं जो किसी भी प्रकार के शोषण के शिकार हैं। इस शोषण के खिलाफ लड़ाई हर स्तर पर लड़ते रहने की आवश्यकता है।

-विश्वनाथ सचदेव

http://www.dainiknavajyoti.net से साभार

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